साइकिल मैकेनिक की बेटी ने रचा इतिहास, अस्मिता डे ने जूडो में जीता भारत का पहला कॉमनवेल्थ गोल्ड

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बड़ी खबर: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में त्रिपुरा की अस्मिता डे ने महिलाओं की 48 किलोग्राम जूडो स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली खिलाड़ी बनीं।

दिनांक: 7 अगस्त 2026
स्थान: ग्लासगो, स्कॉटलैंड

अस्मिता का यह सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। त्रिपुरा के बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता के पिता साइकिल मैकेनिक थे और सीमित आमदनी के बावजूद उन्होंने बेटी के जूडो के सपने को पूरा करने में हर संभव मदद की।

अस्मिता ने बताया कि उनके पिता उनके खेल को लेकर हमेशा उनका हौसला बढ़ाते थे। चोट के दौरान भी वह उनकी मदद के लिए दिल्ली आए थे। लेकिन दिसंबर 2025 में ब्रेन स्ट्रोक के कारण उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद अस्मिता को लगा कि उनका सपना अधूरा रह जाएगा और उन्होंने ट्रेनिंग छोड़ने के बारे में सोचा।

पिता के निधन के करीब 10 दिन बाद उनकी मां ने उन्हें दोबारा ट्रेनिंग पर जाने के लिए कहा। मां ने उन्हें समझाया कि अगर वह अब रुक गईं तो उनके पिता का सपना अधूरा रह जाएगा। इसके बाद अस्मिता ने फिर से ट्रेनिंग शुरू की और अपनी तैयारी जारी रखी।

ग्लासगो में महिलाओं की 48 किलोग्राम जूडो स्पर्धा के फाइनल में अस्मिता का मुकाबला कनाडा की हेइडी क्वाच से हुआ। मुकाबला निर्धारित समय में बराबरी पर रहा और गोल्डन स्कोर में अस्मिता ने निर्णायक अंक हासिल कर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया।

इस ऐतिहासिक जीत के बाद अस्मिता ने अपने पिता को याद किया। उनके लिए यह पदक सिर्फ खेल की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस पिता के सपने को पूरा करने का पल भी था, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद बेटी को आगे बढ़ने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया।

अब अस्मिता की नजर आने वाली बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है। उनकी कहानी संघर्ष, परिवार के सहयोग और मेहनत से इतिहास रचने की प्रेरणादायक मिसाल बन गई है।

निष्कर्ष:

अस्मिता डे का स्वर्ण पदक भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है। एक साइकिल मैकेनिक की बेटी से लेकर कॉमनवेल्थ चैंपियन बनने तक का उनका सफर बताता है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद मजबूत इरादे और परिवार का साथ सपनों को हकीकत में बदल सकता है।

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