FCRA कानून में संशोधन को अमेरिकी सांसद ने बताया ‘ईसाई विरोधी’, भारत में प्रस्तावित बदलाव पर उठे सवाल

NRC News Hindi: FCRA कानून में संशोधन को अमेरिकी सांसद ने बताया ‘ईसाई विरोधी’, भारत में प्रस्तावित बदलाव पर उठे सवाल

बड़ी खबर: भारत के FCRA यानी विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन को लेकर अमेरिका में सवाल उठाए गए हैं। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने प्रस्तावित बदलावों को ईसाई संगठनों के लिए चिंता का विषय बताते हुए इसे “ईसाई विरोधी” करार दिया है। उन्होंने कहा कि इससे विदेशी फंड प्राप्त करने वाले चर्च और धार्मिक संस्थानों पर असर पड़ सकता है।

दिनांक: 7 अगस्त 2026
स्थान: नई दिल्ली

FCRA भारत में विदेशी चंदे और आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाले संगठनों को नियंत्रित करने वाला कानून है। मार्च 2026 में FCRA संशोधन विधेयक पेश किया गया था। प्रस्तावित बदलावों में उन संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और उससे बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े प्रावधान शामिल हैं, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, संस्था खुद पंजीकरण छोड़ देती है या उसका नवीनीकरण नहीं होता।

अमेरिकी सांसद राइली मूर ने 4 अगस्त को इस प्रस्तावित कानून पर प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया कि इससे सरकार को चर्च और धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों पर नियंत्रण हासिल करने की शक्ति मिल सकती है। उन्होंने इसे भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों के लिए भी चिंता का विषय बताया।

इस मुद्दे पर अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ भी पहले चिंता जता चुके हैं। मई 2026 में उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से भारत यात्रा के दौरान FCRA संशोधनों का मुद्दा भारतीय अधिकारियों के सामने उठाने और प्रस्तावित बदलाव वापस लेने की अपील की थी।

प्रस्तावित संशोधन के समर्थकों का कहना है कि इसका उद्देश्य विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों की जवाबदेही और निगरानी को मजबूत करना है। वहीं, आलोचकों का तर्क है कि नए प्रावधानों से विदेशी सहायता पर निर्भर गैर-सरकारी और धार्मिक संस्थाओं के सामने मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

FCRA को लेकर विवाद का एक प्रमुख मुद्दा उन संपत्तियों से जुड़ा है, जिन्हें विदेशी योगदान से बनाया गया है। प्रस्तावित व्यवस्था में ऐसी संस्थाओं के पंजीकरण की स्थिति खराब होने पर इन विदेशी फंड और उससे जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन की व्यवस्था की गई है। इसी प्रावधान को लेकर अमेरिकी सांसदों और कुछ धार्मिक संगठनों ने चिंता जताई है।

भारत में सरकार का तर्क रहा है कि विदेशी योगदान का इस्तेमाल नियमों के अनुरूप होना चाहिए और विदेशी फंडिंग से जुड़े संगठनों पर निगरानी जरूरी है। दूसरी ओर, आलोचक इसे विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों पर नियंत्रण बढ़ाने वाला कदम बता रहे हैं। इसी मतभेद के कारण FCRA संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय चर्चा तेज हुई है।

निष्कर्ष:

FCRA संशोधन विधेयक को लेकर भारत में जहां विदेशी फंडिंग और संगठनों की जवाबदेही का मुद्दा प्रमुख है, वहीं अमेरिका में इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर सवाल उठाए जा रहे हैं। अमेरिकी सांसदों की आपत्तियों के बाद इस प्रस्तावित कानून को लेकर भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में भी चर्चा बढ़ गई है।

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