हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों की हलचल तेज़ हो चुकी है। गांव-गांव में चर्चाएं हैं, बैठकों का दौर चल रहा है और बड़ी संख्या में लोग चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। लोकतंत्र में चुनाव लड़ना हर नागरिक का अधिकार है और यह एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहचान भी है। लेकिन केवल चुनाव लड़ना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को समझना भी उतना ही आवश्यक है। आज कई लोग केवल पहचान, प्रभाव या भावनाओं के आधार पर चुनाव मैदान में उतर जाते हैं। कुछ लोग इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं, जबकि पंचायत जैसी संस्था का उद्देश्य समाज सेवा, विकास और जनहित होता है। इसलिए चुनाव में उतरने से पहले व्यक्ति को अपनी योग्यता, समझ, धैर्य और समाज के प्रति दृष्टिकोण का भी ईमानदारी से मूल्यांकन करना चाहिए। नेतृत्व केवल भाषण देने से नहीं आता, बल्कि समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए लगातार काम करने से बनता है। पंचायत प्रतिनिधि गांव का सबसे नजदीकी जनप्रतिनिधि होता है। लोगों की छोटी-बड़ी समस्याएं उसी तक सबसे पहले पहुंचती हैं। पानी, सड़क, सफाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी और युवाओं के लिए अवसर जैसे मुद्दों पर काम करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। ऐसे में केवल चुनाव जीतना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज के लिए सकारात्मक बदलाव लाना असली उद्देश्य होना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि उम्मीदवार अपने घोषणापत्र (Manifesto) को स्पष्ट रखें। जनता से किए गए वादे केवल चुनावी भाषण बनकर न रह जाएं। जो कहा जाए, उसे निभाने का प्रयास भी होना चाहिए। लोगों का विश्वास जीतना आसान नहीं होता, और जब जनता उम्मीद के साथ किसी को चुनती है तो उस विश्वास को बनाए रखना प्रतिनिधि का कर्तव्य बन जाता है।
चुनाव के दौरान एक और चिंताजनक बात देखने को मिलती है कि लोग बाकी उम्मीदवारों को अपना दुश्मन मानने लगते हैं। कई बार चुनावी प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल जाती है और रिश्तों में वर्षों तक कड़वाहट बनी रहती है। पंचायत चुनाव गांवों के भाईचारे और सामाजिक एकता को तोड़ने का माध्यम नहीं बनने चाहिए। चुनाव लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा है, युद्ध नहीं। हार-जीत लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन रिश्ते और सामाजिक सौहार्द उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि कोई व्यक्ति समाज सेवा में आया है तो उसे भाई-भतीजावाद, पक्षपात और व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठना होगा। पंचायत जनता की होती है, किसी एक परिवार या समूह की नहीं। सही प्रतिनिधि वही है जो हर वर्ग को साथ लेकर चले, बिना भेदभाव के काम करे और गांव के विकास को प्राथमिकता दे। पारदर्शिता और ईमानदारी ही एक जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी ताकत होती है। युवाओं की भागीदारी भी इन चुनावों में बढ़ रही है, जो एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन युवाओं को केवल जोश नहीं, बल्कि समझ और धैर्य के साथ आगे बढ़ना होगा। सोशल मीडिया पर प्रचार करने से ज्यादा जरूरी है कि लोग ज़मीनी स्तर पर समाज के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझें। सेवा का भाव केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में दिखना चाहिए।
साथ ही मतदाताओं की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जनता को चाहिए कि वह साफ-सुथरी छवि, पढ़े-लिखे, समझदार और ईमानदार व्यक्ति को चुने। वोट किसी लालच, दबाव, जात-पात या छोटे-मोटे प्रलोभनों के आधार पर नहीं बिकना चाहिए। चुनाव के समय कई तरह के वादे और दिखावे किए जाते हैं, लेकिन मतदाता को समझदारी और जागरूकता के साथ निर्णय लेना चाहिए। ऐसे प्रतिनिधि चुनें जो वास्तव में मेहनती हों, समाज के हर वर्ग की चिंता करते हों और सही मायनों में आम तथा गरीब जनता के काम आने वाले हों। जो केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि लोगों के मुश्किल समय में भी उनके साथ खड़े रहें। गांव का विकास उन्हीं लोगों के हाथों में सुरक्षित है जिनके भीतर सेवा भावना, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भाव हो। इसके अलावा जनता को भी केवल आलोचना तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि चुने गए प्रतिनिधियों का सहयोग करते हुए गांव के विकास में अपनी भागीदारी निभानी चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब जनता और जनप्रतिनिधि दोनों अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाएं। अंत में यही कहा जा सकता है कि पंचायत चुनाव केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के लिए कुछ अच्छा करने का अवसर हैं। चुनाव लड़ना हर किसी का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार के साथ जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और सेवा भावना भी जरूरी है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब चुनाव व्यक्तिगत अहंकार नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम बनेंगे।
केशव कौण्डल
{हिमाचल प्रदेश}
Tags
EDITORIAL


सारगर्भित लेख
जवाब देंहटाएं