अमेरिका की एक संघीय अदालत ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू की गई 1 लाख डॉलर की H-1B वीजा फीस को अवैध घोषित कर दिया है। अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो सोरोकिन ने अपने फैसले में कहा कि यह शुल्क वास्तव में एक "कर" की तरह है और इसे लागू करने का अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं।
यह शुल्क सितंबर 2025 में लागू किया गया था। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि इससे अमेरिकी कंपनियों द्वारा विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता कम होगी और स्थानीय नागरिकों को अधिक रोजगार मिलेगा। हालांकि कई राज्यों, कंपनियों और संगठनों ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी थी।
मुकदमे में 20 डेमोक्रेटिक अटॉर्नी जनरलों ने दलील दी कि इतनी बड़ी फीस से विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, टेक कंपनियों और सरकारी संस्थानों को कुशल विदेशी कर्मचारियों की भर्ती करने में कठिनाई होगी। अदालत ने भी माना कि इस प्रकार की फीस लगाने के लिए कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक थी।
H-1B वीजा कार्यक्रम का सबसे अधिक लाभ भारतीय पेशेवरों को मिलता है। हर साल बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ इस वीजा के माध्यम से अमेरिका में काम करने जाते हैं। इसलिए अदालत के इस फैसले को भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार पहले H-1B वीजा प्रक्रिया की लागत आमतौर पर कुछ हजार डॉलर तक सीमित थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 1 लाख डॉलर शुल्क ने कंपनियों की चिंता बढ़ा दी थी। कई टेक कंपनियों ने इस नीति का विरोध किया था।
हालांकि ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि वह इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील कर सकता है। ऐसे में आने वाले समय में यह मामला अमेरिकी न्यायिक व्यवस्था में और आगे बढ़ सकता है।
तथ्य जांच:
- अमेरिकी संघीय अदालत ने 1 लाख डॉलर H-1B वीजा शुल्क को गैरकानूनी घोषित किया है
- न्यायाधीश लियो सोरोकिन ने कहा कि यह शुल्क एक कर के समान है
- अदालत के अनुसार ऐसा कर लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है
- 20 राज्यों के अटॉर्नी जनरलों ने इस नीति को अदालत में चुनौती दी थी
- ट्रंप प्रशासन इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकता है
- भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी टेक कंपनियों को इस फैसले से राहत मिल सकती है
निष्कर्ष: H-1B वीजा शुल्क को लेकर आया यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। अदालत के आदेश से भारतीय पेशेवरों और विदेशी प्रतिभाओं को नियुक्त करने वाली कंपनियों को राहत मिली है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि ट्रंप प्रशासन इस फैसले को चुनौती देता है या नहीं।
